Satwant Kaur vs. New India Assurance Company Limited

यह मामला बीमा लोकपाल द्वारा काफी बार इस्तेमाल होता है। आईये देख़ते हैं कि इस मामले के खास पहलु।

क्या था विवाद ?

परियादी का पति New India Assurance Co. Ltd.का पॉलिसी धारक था। उनकी Rs.23271 की claim को बीमा कंपनी ने ख़ारिज कर दिया। New India का तर्क था कि बीमित व्यक्ति पूर्ववर्ती बीमारी से ग्रसित था। उनको मधुमेह तथा गुर्दे की लम्बे अरसे  से शिकायत थी। लेकिन यह बात प्रपोजल फॉर्म में बताई नहीं गई, इसलिए क्लेम स्वीकृत नहीं हुई। दो स्वतंत्र डॉक्टरों की भी राय ली गयी। उनका भी यह निष्कर्ष था कि पुरानी बीमारियों को छिपाया गया था। 

डिस्ट्रिक्ट फोरम का निर्णय 

डिस्ट्रिक्ट फोरम ने  आदेश दिया  कि स्वतंत्र डॉक्टरों की बात इसलिए नहीं मानी जा सकती है क्योंकि उन्होंने ने कभी भी बीमित व्यक्ति ( जिनका देहांत हो चुका था), का इलाज नहीं किया था। अस्पताल की भी रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं थी । पॉलिसी को दो साल आठ महीने के बाद रद्द   कर दिया गया जो उचित नहीं है। बीमा कंपनी का निर्णय गलत था क्योंकि तथ्यों को ध्यान में नहीं रखा गया और निर्णय लेने में बहुत समय लगा दिया गया। 

स्टेट कमीशन का फैसला 

प्रपोजल फॉर्म में गलत उत्तर दिए गए इसलिए New India का निर्णय सही था। 

नेशनल कमीशन का फैसला 

स्टेट कमीशन का फैसला सही है, उसमे सुधार की कोई जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि पॉलिसी लेने के समय बीमारी थी या नहीं ? Section 45 (इंश्योरेंस एक्ट ) के अनुसार अगर जीवन बीमा पॉलिसी हो तो बीमा कंपनी एक निश्चित समय के बाद पॉलिसी पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकती है।  लेकिन स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी पर यह सेक्शन लागू नहीं होता।* लेकिन मेडिक्लेम पॉलिसी  भी बीमा अनुबंध है। महत्वपूर्ण तथ्यों का पूरा प्रकटीकरण अनिवार्य है . प्रस्तावक इस बात का निर्णय नहीं ले सकता है कि कौन सा तथ्य आवश्यक है कौन सा नहीं। निस्संदेह तथ्य वही सामने लाये जा सकते हैं जिसकी जानकारी प्रस्तावक को है। प्रस्तावक का दायित्व है कि  हर महत्वपूर्ण जानकारी को प्रकट करे।  

United India v/s.M K J Corporation में इस कोर्ट की टिप्पणी थी कि बीमा अनुबंध में पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए।  Macgillivray on insurance law में प्रस्तावक का दायित्व माना गया है कि वह हर आवश्यक तथ्य सामने लाएं। अन्यथा उसकी पॉलिसी रद्द हो सकती  है। 

300 साल पहले Lord Mansfield ने कहा था कि underwriter को अगर सच नहीं पता हो तो वह गलत पॉलिसी issue कर सकता है जो बीमा के मूल स्वरूप के विरुद्ध है। 

सवाल यह की आवश्यक तथ्य क्या हैं ? ऐसा कोई भी तथ्य जो underwriter को प्रीमियम के आकलन में जरूरी है या  पॉलिसी  प्रस्तावक को दी जाएगी या नहीं, महत्वपूर्ण है। IRDAI ने आवश्यक तथ्यों की व्याख्या इस तरह से की है - “ essential, important and relevant “      

 ऐसा तो संभव नहीं है की बीमित व्यक्ति को अपनी बीमारी के बारे में जानकारी न हो। यह कोर्ट मानता है कि तथ्यों को छुपाया गया। बीमा कंपनी का निर्णय सही है।   

  • According to IRDAI guidelines, effective from 1st Oct,2020, a health policy cannot be called into question after 8 years


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